हर सुभह

हर सुभह जब आकाश खिलता है

सूरज निकलता है,खुशबु भर देता है

 नयी ताज़गी से मेरे ह्रदय के दरवाजे पर

एक आश की थाली में, प्यार भर लाता है

वह तो मेरा मन , करवट बदलकर

आँखे मूंद कर, उसे जाने को कहता है

हर सुभह जब कोयल मुझे जगाती है

शीतल पवन के पंख पर ,फूलो की सुघन्द लेकर

नयी ताज़गी से मेरे ह्रदय के दरवाजे पर

एक विशवास की थाली में, उम्मीद जगाती है

वह तो मेरा मन , करवट बदलकर

आँखे मूंद कर, उसे जाने को कहता है



एहसास

तुम न हो आसपास तो अधूरा सा लगता है
दिल पर एक पत्थर सा हो ऐसा लगता है
कैसे करू बयान किस तरह तुम छाये हो
ज़िन्दगी से निकल गयी हो जान वैसा लगता है

खुदा ने खुद को उतारा है ज़मीं पर तेरी रूह बनकर
किस तरह मिलाया उसने मुजको मुझसे
एक पत्थर पर रहमे-नज़र करके
मूरत को दी हो जान वैसा लगता है

तुम न हो आसपास तो अधूरा सा लगता है
दिल पर एक पत्थर सा हो ऐसा लगता है